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Sunday, 22 September 2013

गोनू झा लेलनि बदला


                                       गोनू झा लेलनि बदला

                                                              - अमलेन्दु शेखर पाठक 

गोनू झा केर उन्नतिसँ हुनकर कतेको टोलबैया डाह रखै छल। ओ सभ सदिखन चाहथि जे कोनो तरहेँ गोनू झाकेँ क्षति होनि। खुरलुच्ची धियापुताकेँ सिखा गोनू झाकेँ किछु ने किछु नोकसान करा देथि। एक बेर गोनू झाकेँ खूब धान उपजलनि। धान कटबा खरिहानमे रखबेलनि। दुष्ट प्रवृत्ति वला सभ एक गोट नढ़ेर नेनाकेँ टाका देबाक लोभ दऽ सिखा देलनि। ओ रातिमे चुपेचाप गेल आ गोनू झाक खरिहानमे आगि लगा देलक। देखिते-देखिते सौँसे खरिहार छाउरे-छाउर भऽ गेल। गोनू झा अपन समाङ आ टोलक हितचिन्तक सभक संग आगि मिझेबाक प्रयास केलनि, मुदा किए एको दाना बचतनि? डाह रखनिहार सभ प्रसन्न भऽ गेल। गोनू झा मने मन सभ बातक अनुमान करै छला। हुनका सन्देह छलनि जे क्यौ जानि कऽ आगि लगबेलक। घर एला तँ पत्नी पेटकान देने रहथिन। हुनका बुझा-सुझा शान्त केलनि। आ लगला खेधा करऽ जे के आगि लगेलक आ किए लगेलक?
नढ़ेर आगि तँ लगा देलक, मुदा धान जरैत देखि ओ पछताय लागल। ओकरा गोनू काका सन नीक लोकक धान जरेबाक अपराधा बोध होइ छलै। जखन बर्दास्त नञि भेलै तँ आबि गोनू झाक पैर पकड़ि माफी मङैत सभटा बात कहि देलकनि। गोनू झा ओकरा माफ करैत कहलथिन जे ई बात ओ ककरो लग नञि बाजय।
गोनू झा सोचलनि जे एकर बदला लेल जाय। बस अगिले दिन खरिहार पहुँचला आ बरद गाड़ीपर सभटा राख लदबेलनि आ बिदा भऽ गेला पेठिया। राख उठबैत देखि दुष्ट सभ सोचलक जे धान जरि जेबासँ हिनकर दिमाग खराब भऽ गेलनि अछि, मुदा साँझमे जखन गोनू झा हँसैत-गबैत भरल गाड़ी लऽ घुरला तँ सभ चौँकि गेल। टोलबैया सभ गोनू झासँ पुछलथिन जे राख लऽ गेल रही आ प्रसन्न भऽ घुरलहँु, की बात छै? गोनू झा बिहुँसैत जवाब देलथिन- अरे, धान जारि हमर उपकार भेल तेँ प्रसन्न छी। सभकेँ आश्चर्य भेलनि, ई की कहि रहल छथि? गोनू झा कहलथिन जे काल्हिए अखबारमे पढ़ने रही जे धानक शीशकेँ डाहि असाध्य रोग छोड़ेबाक दबाइ बनै छै। से सभटा राख समेटि पेठियापर गेल रही। बेपारी सभ हाथो हाथ कीनि लेलक। ओ तँ आरो मङै छल, मुदा हमरा तँ आब धाने नञि अछि जे डाहब। वैह सभ बड्ड पाइ देलक तँ एक गाड़ी सोना-चानी कीनि कऽ घुरलहुँ अछि। गोनू झा अपन हित चिन्तक सभकेँ आँखिए आँखिमे इशारा कऽ देने छलथिन, से ओ सभ तँ बूझि गेला जे गोनू झा कोनो चालि चलि रहला अछि, मुदा दुष्ट सभ नञि बुझलक। ओ सभ गोनू झासँ खोधि-खोधि कऽ बेपारी आ कोन पेठियापर राख बिकायत से पुछलनि। अगिले दिन ओ सभ अपन-अपन खरिहान डाहि पेठिया बिदा भेला। पेठिया पहुँचला आ सभ बेपारीसँ राख किनबा लेल कहथि। सभ हिनका सभकेँ बताह बूझि हँसि कऽ चलि जाय। साँझमे ओ सभ माथ नोचैत गाम घूरल तँ देखैत अछि जे गोनू झा अपना खेतमे राख छिटबा रहल छथि। मुँह बिधुएने घूरल दुष्ट टोलबैया सभकेँ देखि गोनू झा पुछलनि- नञि भेटल बेपारी? की करबै चलि गेल हेतै। राख सभ खेतमे छीटि लीयऽ अगिला साल नीक उपजा होयत?
भेल छल ई जे गोनू झा राख लऽ गेला आ गामसँ बाहर भरि दिन बिता साँझमे घुरि आयल छला। जखन दोसर दिन गोनू झा दरबार गेला तँ महाराज पछिला दिन नञि एबाक कारण पुछलथिन। गोनू झा सभटा खेरहा कहलनि तँ महाराज प्रसन्न होइत हुनका सय बरद गाड़ी धान गामपर पठबा देलथिन आ इनामो देलथिन। दुष्ट सभकेँ पकड़बा जहल दै छलथिन, मुदा गोनू झा बचा लेलथिन जे बदला तँ ओ लैए चुकल छथि। दुष्ट सभ कान पकड़लक जे फेर गोनू झाक संग अरारि नञि मोल लेता। 

Sunday, 15 September 2013

गोनू झासँ भगवती प्रसन्न

 
                                                                       गोनू झासँ भगवती प्रसन्न
                                                 

                                      - अमलेन्दु शेखर पाठक

गोनू झा अपन ज्ञानसँ महाराजकेँ तँ प्रसन्न करिते छला। चोर-चुहारकेँ तँ छकबिते छला। सर-समाजक लोकक लग तँ अपना प्रत्युत्पन्नमतित्वसँ आदरणीय बनले छला, बेर पड़नि तँ देवी-देवताकेँ सेहो तेहन ठोका जवाब देथिन जे ओहो प्रसन्न भऽ उठथि। एक बेर भगवती कालीक समक्ष तेहन मनोरञ्जक प्रश्न रखलनि जे ओहो अपन भक्त गोनू झासँ प्रसन्न भऽ उठली आ हुनका वरदान देलनि जे बुद्धि-ज्ञानमे हुनका कहियो क्यौ ने पछाड़ि सकत।
भेलै जे गोनू झा नित्य भगवतीक पूजा करथि। एक दिन मनमे एलनि जे एते दिनसँ भगवतीक मनसँ विधि पूर्वक पूजा करै छी, मुदा ओ दर्शन नञि देलनि अछि। से आब पूजा तखने छोड़ब जखन ओ दर्शन देती। बस ई ठानि ओ पूजामे जुटि गेला। भरि-भरि दिन कालीक पूजा करऽ लगला। अहल भोरे पूजा शुरू करथि तँ सूर्य डूबि जेबाक बादे उठथि।
एक दिन पूजा-पाठक बाद ओछायनपर पड़ल छला कि हुनक पूजासँ प्रसन्न भऽ भगवती काली दर्शन देबा लेल पहुँचि गेलथिन। काली अपन विकराल स्वरूपमे आयल छली। हुनकर एक सय मुँह छलनि। हाथमे खप्पड़ आ खड्ग रखने छली। गोनू झा हलसि कऽ ओछायनपरसँ उठला आ हुनका प्रणाम केलनि। माताक दर्शनसँ अपनाकेँ कृत-कृत्य मानलनि। कनिञे कालमे गोनू झाक उत्साह बिला गेलनि आ ओ गम्भीर भऽ उठला। भगवती चौँकि उठली। एखने गोनू झा प्रसन्न छला तखन एकाएक चिन्तित किए भऽ गेला। भगवती कारण पुछलथिन तँ गोनू झा बजला- नञि कोनो खास बात नञि। हम ई सोचऽ लगलहुँ जे हमरा सभकेँ एक टा मुँह अछि आ दू टा हाथ अछि। तखन जँ कहियो सर्दी भऽ जाइत अछि तँ नाक पोछैत-पौछैत तबाह रहै छी। दू टा हाथसँ एक टा नाक नञि सम्हरैत अछि, तखन अहाँकेँ तँ एक सय मुँह आ दू टा हाथ अछि। जँ कहियो सर्दी भऽ जाइत होयत तँ दू हाथसँ एक सय नाक कोना सम्हरैत होयत, यैह सोचऽ लागल रही। गोनू झाक बात सुनि भगवती ठठा कऽ हँसि पड़ली आ हुनका आशीर्वाद देलथिन जे बुद्धि-ज्ञानमे दुनिञामे अहाँकेँ क्यौ ने पछारत। दोसर दिन गोनू झा दरबार गेला तँ महाराजकेँ सभटा बात कहलथिन तँ ओहो खूब हँसला आ हुनका एहि मनोरञ्जक बात लेल खूब बिदाइ देलनि। 

Friday, 16 August 2013

गोनू झा साफ करेलनि चोरसँ पछुअति

 
            गोनू झा साफ करेलनि चोरसँ पछुअति  

                                                - अमलेन्दु शेखर पाठक
गोनू झा द्वारा बेर-बेर पछाड़ि देबाक बादो चोरबा सभ हुनका ओहि ठाम चोरि करबाक प्रयास नञि छोड़ि रहल छल। ओ सभ सदिखन बाट तकैते रहै छल जे कोना गोनू झाक घरमे हाथ सुतारी? बेर-बेर गोनू झा अपन चतुरतासँ ओकरा सभकेँ चारि तँ नहिञे करऽ दै छला, तेहन ने छकान छकबै छला जे बहुत दिन धरि ओ सभ हुनका घर दिस हुलकीयो मारबासँ डेराइ छल, मुदा जहाँ किछु दिन बितै छल आ गोनू झाकेँ दरबारसँ पुरस्कार भेटै छलनि कि चोर सभ फेर सक्रिय भऽ जाइ छल। चोर सभ गोनू झाक घरमे चोरि करबाक गौँ तकैत रहै छल आ अवसर भेटिते लार-चार कऽ दै छल। ओमहर चोर सभकेँ लऽ गोनू झा सदिखन चौचंक रहै छला। जखने चोर सभ हुनका घरमे चोरि केर सूरसार करै छल कि गोनू झाक नजरि पड़िए जाइ छलनि। फेर तँ ओ तेहन ने उपाय धराबथि जे चोर सभ बपहारि काटि पड़ाय। से एक दिन मुन्हारि साँझमे जखन गोनू झा दरबारसँ घुमला तँ हुनकर नजरि अपन घरक पछुअति दिस पड़ि गेलनि। भरि-भरि डाँर भाङ आ जंगल-झाड़ भऽ गेल छलनि। मजूर सभकेँ कतेको बेर तमबेबा लेल अनलनि, मुदा जंगल-झाड़ देखि ओ सभ पड़ा जाय। पछुअतिकेँ देखैत गोनू झा विचारि रहल छला जे कोन मजूरकेँ कहि एकरा साफ करा तीमन-तरकारी लगाओल जाय आ कि भाङक बीच बैसल एकगोट चोरपर हुनक नजरि पड़ि गेलनि आ ओ मुसुकि उठला। आङन एला तँ चारू कात सतर्क नजरि देलनि। कोठली सभ देखि ऐला। एहि बीच दू गोट चोरकेँ अपना कोठलीक धरनिपर चढ़ल सेहो देखि नेने छला। भोजन आदि कऽ सुतबा लेल गेला। गोनू झा अपना पत्नीकेँ कहलनि- ‘हे एगो गुप्त बात कहि देबाक मन होइत अछि, देह-नेहक कोन ठेकान? नञि कहने रहब तँ करोड़ो टाकाक सोना, चानी, हीरा, मोती आदि माटिए तरमे रहि जायत।’ पत्नी बिगड़लथिन- ‘अनेरे आइँबाइँ नञि बाजू, अहाँकेँ किए किछु होयत, मुदैकेँ हेतै...।’
गोनू झा कहलथिन- ‘अच्छा-अच्छा हमरा किछु नञि होयत, मुदा गुप्त बात जानि लेब तँ हर्जे की? अहूँकेँ तँ बूझल रहबाक चाही अपन धन-सम्पत्तिक बारेमे?’
पण्डिताइन कहलथिन- ‘बाजू जे कहबाक अछि।’
गोनू झा कहलथिन- ‘अपना पछुअतिमे जे एते जंगल भऽ गेल अछि से हम किए ने साफ करबै छी से बूझल अछि?’
पत्नी बजली- ‘बूझल रहय वा नञि, जंगलमे कोन सोना-रूपा अछि जे ओकरा जोगा कऽ रखने छी...हमरा दिनोमे ओमहर जेबामे डर होइए जे कतहु साँप-कीड़ा ने बहरा जाय।’
गोनू झा हुनका रोकैत कहलथिन- ‘हीरे-मोती दुआरे ने साफ नञि करबै छी। बरखो पहिने राजा ओहि ठामसँ पचास तमघैल सोना, हीरा, मोती, अशर्फी आदि भेटल छल से हम चुपचाप पछुअतिमे गाड़ि देने रही। एखन अपना घरमे जते सम्पत्ति होयत तकर पचासो गुना बेसी अपना पछुअतिमे गाड़ल अछि। हम एही दुआरे ओकरा साफ नञि करबै छी।...अहूँ ध्यान राखब ने कहियो ओकरा साफ करायब आ ने ककरो लग चर्चे करब, नञि तँ चोर-चुहार सभक कानमे पड़ल तँ हम सभ सुतले रहब आ सभ तमघैल उखड़ि जायत।’
घरमे पैसल चोर सभ गोनू झा आ हुनक पत्नीक बात सुनि रहल छल। ओकरा सभक आँखि चमकि उठलै। सभ एकाँएकी घरसँ बाहर भेल। गोनू झा से देखि लेलनि आ निश्चिन्त भऽ सूति रहला। एमहर चोर सभ अपनामे विचार केलक जे गोनू झा ठीके बरखोसँ पछुअति साफ नञि करबै छथि। जरूर एहि ठाम धन-सम्पत्ति गाड़ल अछि। फेर की छल चोर सभ कोदारि लऽ जूमि गेल आ लागल तामऽ। राति भरि सभ तमैत रहल, मुदा किछु नञि भेटल। भोर होबऽ वला छल। सूर्यक लाली पसरब शुरू भऽ गेल छल। ताबत एकगोट चोरक नजरि पड़ल तँ देखैत अछि जे गोनू झा अपना पछुअतिमे कोनटा लग ठाढ़ मुसुकि रहल छला। चोरकेँ अपना दिस तकैत पाबि गोनू झा बजला- ‘वाह! अहाँ सभ तँ पूरा बारी तामि देलिऐ। सभट जंगल साफ कऽ देलहँु...हे कने सुस्ता लीयऽ तखन आर काज करब...अहा-हा अहाँ सभ तँ पसेने-पसेने भऽ गेल छी...कहाँ गेलऽ हो फेकन भाइ कने हिनका सभकेँ जल पियाबऽ।’
जखने गोनू झा हाक देलनि कि चोरबा सभक पकड़ल जेबाक डरसँ प्राण सुखा गेल आ ओ सभ लंक लऽ कऽ पड़ायल। गोनू झा अपन बुद्धिमत्तासँ घरमे चोरि तँ नहिञे होबऽ देलनि, अपन पछुअति सेहो साफ करबा लेलनि। 

Sunday, 4 August 2013

गोनू झा पुरस्कारमे मङलनि सोँटा


         गोनू झा पुरस्कारमे मङलनि सोँटा 
                                               - अमलेन्दु शेखर पाठक 

गोनू झाक बुद्धि आ एहि बलपर महराजक संग हुनक निकटता कतेको दरबारीकेँ खटकै छलनि। ओ सभ सदिखन ओहि अवसरक प्रतीक्षा करैत रहै छला जे गोनू झाकेँ पछाड़ल जाय, मुदा से सम्भवे नञि होइ छल। उन्टे यैह सभ पछड़ि जाइ छला। ओ सभ सदिखन बाटे तकैत रहै छल। संयोगसँ एक बेर एकगोट दरबारीकेँ अवसर लागि गेलै। भेलै ई जे दरबारमे एकगोट पण्डित शास्त्रार्थ लेल एला। महाराज कहलनि जे पण्डितकेँ जे क्यौ हरा देत तिनका पुरस्कार स्वरूप ओ सभ भेटतनि जे ओ मङता। अगिला दिन शास्त्रार्थक समय तय भेल। दोसर दिन निश्चित समयपर दरबारी आ पण्डित सभ दरबारमे पहुँचि गेला, मुदा संयोगसँ गोनू झाकेँ पूजा-पाठमे अबेर भऽ गेलनि। ओ धड़फड़ायल पहुँचला, मुदा ताबत द्वारपाल दरबारमे प्रवेशक करबाक द्वार बन्न कऽ देने छल। गोनू झा ओकरा द्वार खोलबा लेल कहलनि तँ ओ महाराजक बिगड़बाक बात कहि मना कऽ देलक। गोनू झा जनै छला जे ईहो द्वारपाल आन दरबारी जकाँ हिनकासँ ईर्ष्या करै छनि आ लोभी सेहो अछि। मने मन ओकरा छकेबाक निर्णय लऽ गोनू झा कहलथिन जे जँ द्वारपाल द्वार खोलि देत तँ शास्त्रार्थमे विजयी रहबापर जे किछु पुरस्कारमे भेटतनि से ओकरा दऽ देथिन। द्वारपाल हलसि कऽ खोलि देलक आ गोनू झा दरबारमे पहुँचला। शास्त्रार्थमे गोनू झा ओहि पण्डितकेँ अपन बुद्धि-ज्ञानसँ पछाड़ि देलनि। महाराज प्रसन्न भऽ गोनू झाकेँ सोना-चानी-हीरा आदि पुरस्कारमे देबाक घोषणा केलनि तँ गोनू झा कहलनि- महाराज अपने कहने रही जे शास्त्रार्थमे विजयी रहनिहारकेँ वैह पुरस्कारमे देबनि जे ओ मङता। महाराज कहलथिन- माङू की मङै छी। तखन गोनू झा पुरस्कारमे सोँटा मङलनि आ कहलनि जे ओहिसँ हुनका पीटल जाय। महाराज सहित सभ दरबारी आश्चर्यचकित रहि गेला। महाराज हुनका कतबो कहलथिन, मुदा गोनू झा अपन निर्णयसँ पलटबा लेल तैयार नञि भेला। ओ महाराजकेँ इशारा सेहो कऽ देलथिन जाहिसँ महाराज बुझि गेला जे फेर गोनू झा ककरो मूर्ख बनबऽ चाहै छथि, तेँ ओ एकर आदेश दऽ देलथिन। सोँटा आनल गेल। एक गोटे सोँटा लऽ जखने गोनू झा दिस बढ़ला कि ओ द्वारपालकेँ आवाज देलनि- कहाँ छी यौ आजुक पुरस्कार लीयऽ। द्वारपाल एहि लोभमे ओही ठाम छल जे पुरस्कारमे भेटल सभटा स्वर्णाभूषण आइ ओकरे हाथ लागत। गोनू झाक बुधियारी देखि डरे सिटपिटा गेल। तखन गोनू झा सभटा खेरहा महाराजकेँ कहलनि। महाराजक संग सभ ठहाका मारि हँसि पड़ल। गोनू झाक बुद्धिमत्तासँ प्रसन्न भऽ महाराज हुनका पहिनोसँ बेसी पुरस्कार दऽ बिदा केलनि आ द्वारपालकेँ कारागारमे रखबाक आदेश देलनि, मुदा गोनू झा महाराजसँ आग्रह कऽ ओकरा बचा लेलनि। ओ गोनू झाक पैर पकड़ि माफी मङलक आ फेर कहियो गोनू झाक संग एना नञि करबा लेल कान पकड़लक। 

Tuesday, 30 July 2013

गोनू झा केर कम्मल


                                                             
                        गोनू झा केर कम्मल

                                                                 - अमलेन्दु शेखर पाठक 

गोनू झाक बुद्धि आ ज्ञानक जते लोक प्रशंसक छला ततबे हुनक विरोधी सेहो छला। हुनक धन-बीतसँ जरै छला। सदिखन अवसर तकै छला जे कखन गोनू झाक दुनू भाइमे झञ्झटि होनि जे बीचमे पड़ि गोनू झाकेँ हानि पहुँचाबथि। गोनू झाक भाइ भोनू झा छला सुधबौक। ओ छल-प्रपञ्च जनै ने छला। से जहाँ कोनो टोलबैया कनेको चढ़ेलक-बढ़ेलक कि बाँट-बखरा लेल तैयार भऽ जाइ छला। ओ लोकक चढ़ौअलि-बढ़ौअलि नञि बूझथि। से एक बेर भोनू झाकेँ किछु गोटे सिखा-पढ़ा देलकनि जे गोनू झासँ बाँटि लीयऽ नञि तँ कहियो विकास नञि करब। एहि बेर भोनू झा अड़ि गेला। गोनू झा कतबो बुझेलनि ओ मानबा लेल तैयारे ने भेलथिन। हारि कऽ गोनू झा बाँट लेल तैयार भऽ गेला।
गोनू झाक विरोधी सभ जखने ई सुनलनि सभक छाती जुड़ा गेलनि। ओ सभ भोनू झाक पक्षसँ पञ्च भऽ कऽ एला। गोनू झा तँ असलीहत बुझै छला। ओ मने मन पञ्च सभकेँ पछाड़बाक आ भोनू झाकेँ फेरसँ संग करबाक विचार केलनि। हुनकर ध्यान कम्मल दिस गेलनि आ ओ मुसुकि उठला। ओ पञ्च सभसँ ई स्वीकार करबा लेलनि जे जकरा हिस्सामे कम्मल जखन रहत तखन ओ अपना हिसाबे ओकर उपयोग करत।
बाँट-बखरा भऽ गेल। सभ समान गोनू झा आ भोनू झामे बरोबरि कऽ बँटा गेल। रहि गेल एगो कम्मल। समस्या छल जे ओ एके टा छल। ओकरा कोना बाँटल जाय जे दुनूकेँ भेटनि। गोनू झाक विरोधी सभ चालि चललनि। कम्मलक बाँट एना कऽ देलनि जे दिनमे ओ गोनू झा रखता आ रातिमे भोनू झा। गोनू झाक विरोधी टोलबैया सभ मने मन प्रसन्न छल जे एहि बेर हिनकर सभ बुधियारी घुसरि जेतनि, मुदा गोनू झा अपनो यैह चाहै छला। ओ प्रसन्न भऽ गेला। बाँट-बखराक दुइ दिन बाद भोनू झाकेँ फेर पञ्च सभकेँ बजाबऽ पड़लनि। कारण छल जे गोनू झा दिनमे कम्मल तँ राखथि, मुदा साँझ पड़बासँ पहिने ओकरा पानिमे बोरि भिजा देथि। आब रातिमे जखन भोनू झाक हिस्सामे कम्मल भेटनि तँ ओ तते तीतल रहै छल जे उपयोगे ने कयल जा सकै छल। भोनू झाक शिकाइतपर पञ्च सभ गोनू झाकेँ आबि टोकलथिन। गोनू झाक उत्तर छलनि जे हुनका हिस्सामे जखन दिनमे कम्मल छनि तँ ओकर उपयोग हुनका जेना मन हेतनि तेना ने करता। ओ रातिमे तँ कम्मल नञि भिजबै छथि। आब पञ्च सभ निरुत्तर रहि गेला। भोनू झा सेहो बुझि गेला जे गोनूक ज्ञानक आगाँ ककरो चलऽवला नञि। ओ फेरसँ गोनू झाक संग भऽ गेला। जखन गोनू झा दरबार गेला आ महराजकेँ पता लगलनि तँ ओ गोनू झाक बुधियारीक प्रशंसा केलनि। एहि लेल हुनका दान-दक्षिणामे सोना, चानी, हीरा आदि भेटलनि आ महराज एगो कम्मल सेहो देलथिन जे दुनू भाइ लग एक-एक टा भऽ जायत। आब भोनू झा बुझलनि जे गोनू झाक संग रहबासँ की लाभ अछि?

Tuesday, 23 July 2013

गोनू झाक महीँस

                                       गोनू झाक महीँस
                                                                 - अमलेन्दु शेखर पाठक
गोनू झा केर भाइ छलथिन भोनू झा। एक बेर दुनू भाइमे बाँट बखरा भऽ गेलनि। सभ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ गेल। जे समान जोड़ामे छल, माने दू-दू चारि-चारि केर संख्यामे छल से तँ सहजतासँ बँटा गेल, मुदा जे एके टा छल तकरा कोनो बाँटल जाय? ई पैघ समस्या छल। गोनू झा चाहै छला जे महीँसक सेवा दूनू भाय करथि। ओकरा दुनू गोटे खाय-पीबऽ लेल देथि आ दूध आधा-आधा बाँटि लेथि, मुदा भोनू झाकेँ लोक सभ चढ़ा-बढ़ा देने छलनि तेँ ओ मानबा लेल तैयारे नञि भेला। गोनू झा कतबो बुझेलथिन, मुदा ओ टोलबैया सभक सिखेबाक कारणेँ महीँस बँटबापर अड़ल रहि गेला। अन्तमे गोनू झा हुनकेपर छोड़ि देलथिन जे जेना मन होनि तेना करथु।
एमहर गोनू झाक विकाससँ टोल-पड़ोसक लोक सभमेसँ कतेको जरै छल। कतेको गोटे हुनका छकेबाक प्रयासमे विफल रहल छला से सभ अवसर तकै छला जे कोना हुनका पछाड़ल जाय। एहन लोक सभकेँ गौँ भेटि गेलनि। ओ सभ भोनू झासँ सटि गेला आ आरो चढ़ा-बढ़ा देलनि जे महीँसोक बाँट कराबथु। भोनू झा हुनके सभकेँ पञ्चैती लेल बजेलनि। सभ बैसि कऽ पञ्चैती कऽ देलनि जे महीँसकेँ आगाँ आ पाछाँ दू भागमे बाँटि देल जाय। अगिला हिस्सा गोनू झाकेँ भेटलनि आ पछिला भोनू झाकेँ।
अगिला हिस्सामे महीँसक मुँह पड़ै छल से गोनू झा रोज महीँसकेँ खुआबथि आ पछिला हिस्सामे थनमे पड़ै छल से भोनू झा बिना कोनो तरद्दुतकेँ आरामसँ रोज दूध दूहथि आ दही-दूध खाथि-पीबथि। गोनू झाकेँ बिना किछु केने गोबर सेहो भऽ जानि, जकरा खेतमे पटाबथि। एहिसँ हुनक उपजो बढ़ि गेलनि। गोनू झा भायक सिनेहमे चुपमे छला। एक दिन टोलबैया सभ हुनक कौचर्य केलकनि जे बड़ा दिमाग वला छथि, केहन छकेलियनि।
ई बात गोनू झाकेँ बड़ अप्रिय लगलनि। ओ तय केलनि जे सभक बुधियारी घुसारि देता। फेर की छल, अगिला दिनसँ जखने भोनू झा महीँस दुहबा लेल बैसथि कि गोनू झा महीँसक मुँहपर सोँटा लऽ पीटऽ लागथि। एहिसँ महीँस छटपटाय लागय आ लथार चलबऽ लागय। भोनू झा महीँसकेँ दूहिए ने पाबथि। ई क्रम जखन दू-चारि दिन चलल तँ भोनू झा एकर शिकाइत पञ्च सभसँ केलनि। सभ फेर जुटला। गोनू झाकेँ पुछलथिन जे ओ एना किए करै छथि जे भोनू झा महीँसकेँ दूहि नञि पबै छथि?
गोनू झा मुस्कियाइत उत्तर देलथिन जे अपना हिस्सामे किछु करै छथि ताहिसँ ककरो की मतलब? ओ भोनू झाक हिस्सामे तँ नञि किछु करै छथि? ककरो लग कोनो उत्तरे नञि छल। भोनू झा सेहो बूझि गेला जे ओ गोनू झासँ अराड़ि मोल लऽ नञि टीकि सकै छथि। ओ गोनू झा लग हारि मानि लेलनि आ तकर बाद दुनू भाय मिलिजुलि कऽ महीँसकेँ खुआबथि-पियाबथि आ दूध आधा-आधा बाँटि लेथि। गोनू झासँ ईर्ष्या रखनिहार टोलबैया सभ मुँहे बबैत रहि गेल।

गोनू झा छकेलनि चोरकेँ

                    गोनू झा छकेलनि चोरकेँ
                                                              - अमलेन्दु शेखर पाठक 
गोनू झा अपन तीक्ष्ण बुद्धि आ ज्ञानकेँ लऽ समग्र मिथिलामे चर्चित तँ छलाहे ओ राज दरबारमे सेहो यशस्वी छला। सदिखन अपन बुधियारीक बलपर पुरस्कार पबिते रहथि। हुनका घरमे सोना, चानी, हीरा आदिक अमार लागल रहै छलनि। एहि कारणेँ चोर-चुहार सदिखन हुनका घरपर नजरि टिकेने रहै छल जे कखन मौका भेटय आ सभटा धन पार कऽ दी, मुदा सभ बेर ओकरा सभकेँ गोनू झा अपन बुधियारीसँ पछारि देथि। चोरि तँ नहिञे कऽ पाबय, गोनू झा उन्टे बिना कोनो विशेष प्रयासक ओकरा सभकेँ दण्डित सेहो कऽ देथि। सभ बेर चोरबा सभ बपहारि काटि पड़ाय। सभ बेर चोरबा सभ संकल्प लै छल जे गोनू झाक घरमे चोरि कऽ हुनका पाठ पढ़ेने बिना नञि छोड़त। से एक दिन अवसर भेटिते चोरबा सभ मुन्हारि साँझमे गोनू झाक घरमे पैसि गेल आ छपकि कऽ बैसि गेल आ प्रतीक्षा करऽ लागल जे रातिमे जखन गोनू झा आ हुनक कनिञा सूति रहती तँ सभटा गहना-गुड़िया, सोना-चानी आदि पार कऽ देब।
चोर सभकेँ लऽ गोनू झा सेहो चौचंक रहै छला। से जखन ओ राज दरबारसँ घुमला तँ हुनक नजरि कोठीक पाछाँ नुकायल चोरपर पड़ि गेलनि। गोनू झा मुसुकि उठला आ मने-मन चोरबा सभकेँ पाठ पढ़ेबाक निश्चय केलनि। खा-पी कऽ ओछायनपर एला तँ चर्चा चला कनिञासँ चोर सभक उत्पातपर बात करऽ लगला। एहि क्रममे ओ कनिञाकेँ कहलथिन जे ओ चोर सभक उत्पातक कोनो चिन्ता नञि करथु। गोनू झा हुनकर सभटा गहना-गुड़िया तेना ने नुका कऽ राखि देलनि अछि जे चोरबा सभ की चोरबा सभक बापो ने ताकि सकत। कनिञा पुछलथिन जे कहाँ धऽ देलियै? पहिने तँ गोनू झा कहबासँ नाकर-नुकुर केलनि आ तकर बाद कहलथिन जे बाड़ीक लतामपर मोटरी बान्हि टाङि देने छथि। चोरबा सभ तँ घरमे ने ताकत। भोरे फेर उतारि अनता आ राति कऽ धऽ देता। पहिने तँ कनिञा बाहरमे धन हेबापर चिन्ता प्रकट करैत ओकरा घरमे आनऽ लेल कहलथिन, मुदा जखन गोनू झा खूब बुझेलथिन तँ ओ सूति रहली आ फोँफ काटऽ लगली। एमहर गोनू झा अनमट काढ़ि ओछायनपर पड़ल रहला।
चोरबा सभ ई बात सूनि रहल छल, मुदा गोनू झा कतेको बेर छका देने छला तेँ पहिने एक गोटे लतामक गाछपर मोटरी टाङल अछि कि नञि से देखबा लेल गेल। ओ घुरि कऽ आयल तँ कहलक जे ठीके मोटरी टाङल अछि। आब तँ चोरबा सभ प्रसन्न भऽ गेल जे गोनू झाकेँ होइ छनि जे बड़ बुधियार छी से एहि बेर सभटा बुधियारी घुसरि जेतनि। चोरबा सभ एकाँएकी घरसँ बहरायल से गोनू झा तरे आँखिए देखि चुलक छला। ओ प्रतीक्षा करऽ लगला। ओमहर चोरबा सभ बाड़ीमे लतामक गाछ तर पहुँचल आ खूब पैघ मोटरी टाङल देखि आनन्दे झूमि उठल। सभ लप दऽ गाछपर चढ़ल आ मोटरी उतारबा लेल जहाँ हाथ लगेलक कि बाप-बाप चिकरऽ लागल। असलीहतमे ओ छल मधुमाँछीक पैघ छत्ता। जहाँ चोरबा सभ हाथ लगेलक कि मधुमाँछी सभ ओकरा सभपर टूटि पड़ल। चोरबा सभ गाछपरसँ धपा-धप खसल आ बपहारि कटैत पड़ायल। हल्लापर टोलबैया सभ लाठी लऽ जूटल जे गोनू झाक घर फेर चोर एलनि, मुदा एला तँ देखलनि जे गोनू झा हँसि रहल छथि। जखन सभटा खेरहा कहलनि तँ टोलबैयो सभ हँसैत घूरल आ गोनू झाक बुधियारीक चर्चा एक बेर फेर सौँसे पसरि गेल। राज दरबारमे जखन ई बात पहुँचल तँ महाराज गोनू झाक बुधियारीसँ प्रसन्न भऽ हुनका पुरस्कारमे सोना-चानी दऽ बिदा केलनि। गाूेनू झा बुधियारीसँ चोरबा सभकेँ छका अपन धन बचेलनि आ पुरस्कारमे आरो धन भेटि गेलनि। 

गोनू झाक बेटा

                                                                                         गोनू झाक बेटा
                                                              - अमलेन्दु शेखर पाठक 
गोनू झाक घरपर चोर धपायले रहै छलनि। चोर सभ जनै छल जे गोनू झा राज दरबारमे छथि आ ओहि ठामसँ हुनका बेसी काल सोना-चानी, हीरा-मोती आदि इनाममे भेटिते रहै छनि। चोर सभ सदिखन गोनू झाक घरमे हाथ सुतारऽ लेल बाट तकैत रहैत छल। अपन एक ने एक चटियाकेँ गोनू झाक घर दिस पठबिते रहै छल जे जखने लगौ जे चोरि सम्भव अछि हम सभ जूमि जेबौ।
एक दिन चोर सभकेँ चटियाक समाद भेटल जे आइ गोनू झा सबेरे ओछायनपर चलि गेल छथि तेँ आइ हाथ साफ करबाक अवसर भेटि सकैत अछि। समाद भेटिते चोर सभ जूटल आ बेरा-बेरी गोनू झाक घरमे पैसि गेल। ओ सभ देखलक जे गोनू झा ओछायनपर पड़ल अपना कनिञा संग बतिया रहला अछि। चोर सभ कोठीक दोगमे दम्म साधि नुकायल दुनू बेगतीक सुतबाक प्रतीक्षा करैत हुनक बातो सुनि रहल छल।
ओमहर ओछायनपर पड़ल गोनू झाक नजरि चोरपर पड़ि गेल छलनि। ओ चोर सभकेँ पकड़बाक ब्योँत सोचऽ लगला। भेलनि जे हल्ला करब तँ चोर जँ बेसी संख्यामे होयत तँ पड़ा जायत आ कहीँ अस्त्र-शस्त्र ने रखने हो। चतुर गोनू झाकेँ उपाय फुरा गेलनि। ओ कनिञाकेँ कहलनि जे जखन अपना सभक बेटा होयत तँ हम पहिल केर नाम राखब मोहन।
गोनू झाक कनिञा औँघा रहल छलथिन, तेँ हुनक बातमे रुचि-रस नञि रहल छलथिन। गोनू झा हुनका देह झमारि जगेलनि आ कहलनि- ‘सुनू ने जे दोसर बेटाक नाम राखब लोचन, तेसर केर मोचन आ चारिम केर नाम राखब चोर।’
कनिञाकेँ तँ बूझल रहनि नञि जे घरमे चोर घुसि गेल अछि तकरे पकड़बाक जोगार गोनू झा कऽ रहल छथि। तेँ ओ कहलथिन ‘दुर जाउ चोर कहीँ नाम भेलै... अच्छा जे मन होयत से राखब...जहिया बेटा होयत तहिया ने नाम राखब एखन सूतू।’
गोनू झा चोर वला बात बाजियो नञि सकै छला आ चोरकेँ पकड़बोक छलनि तेँ पत्नीकेँ जगबैत बजला- ‘सूनू ने! चारू बेटाकेँ खूब खुआ-पिया कऽ तन्दुरुस्त राखब आ जखन जरूरति होयत चारूकेँ एक्के बेर सोर पाड़ब मोहन, लोचन, मोचन, चोर हो ऽऽऽऽ....जल्दी आबऽ मोहन, लोचन, मोचन, चोर हो ऽऽऽऽ....।’
गोनू झा जोर-जोरसँ नाम लऽ चिकरि-चिकरि बाजि रहल छला आ कनिञा हँसैत-हँसैत लोटपोट भऽ रहल छलथिन जे बेटा भेलनि नञि आ सभकेँ जोर-जोरसँ बजा रहल छथि, मुदा गोनू झाक आवाज आर जोरे भेल जा रहल छलनि।
एमहर गोनू झाक आवाज सुनि हुनक पड़ोसिया मोहन, लोचन आ मोचन लाठी लऽ पहुँचि गेला। सभ केबाड़ खटखटेलनि कि गोनू झा चट दऽ खोलि देलनि। पड़ोसिया सभ चोर दऽ पुछलकनि तँ देखा देलथिन कोठी दिस। चोर सभ गोनू झाक बात तँ सुनि रहल छल, मुदा गोनू झाक कनिञा जकाँ ओहो सभ खिस्से बूझि रहल छल। ओकरा सभकेँ पते ने छल जे बेटाक नामक बदल गोनू झा अपन पड़ोसियाक नाम लऽ रहल छथि आ चारिम बेटाक नाम जानि कऽ चोर राखि चिचिएला जाहिसँ सभ जुटि जाय। जखन पड़ोसिया सभ जुटि गेला तँ चोर सभकेँ पड़ेबाक बाटे ने सूझल। सभ पकड़ल गेल। लोक सभ जमि कऽ पिटलनि आ राजाक सिपाही सभकेँ पकड़ि कारागारमे धऽ देलक। असलीहत बुझबापर पड़ोसिया सभक संग कनिञा सेहो गोनू झा केर प्रशंसा केलनि आ महराज सुनलनि तँ एहू चतुरता लेल गोनू झा पुरस्कृत कयल गेला। चोरो पकड़ा गेल आ गोनू झा केर घरमे धन सेहो बढ़ि गेल।